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Auto transformer in hindi | auto transformer क्या है और कैसे work करता है।

Auto transformer in hindi | auto transformer क्या है और कैसे work करता है। आज इस पोस्ट में बात किया जाएगा ऑटो ट्रांसफॉर्मर क्या है कैसे काम ...

Auto transformer in hindi | auto transformer क्या है और कैसे work करता है।

आज इस पोस्ट में बात किया जाएगा ऑटो ट्रांसफॉर्मर क्या है कैसे काम करता है और यह कितने प्रकार का होता है इसके साथ साथ इसका उपयोग कहां पर किया जाता है और इसके advantage and disadvantage के बारे में बात किया जाएगा।

Auto transformer क्या है

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ऑटो ट्रांसफॉर्मर समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर ट्रांसफार्मर क्या काम करता है ट्रांसफार्मर एक ऐसा यंत्र होता है जो fixed frequency पे हाई वोल्टेज को लो वोल्टेज में तथा लो वोल्टेज को हाई वोल्टेज में बदलने का कार्य करता है यह कार्य  auto transformer हो या फिर  कोई भी नॉर्मल ट्रांसफार्मर हो सब का कार्य विधि यही होता है। अब जानते हैं कि आखिर ऑटो ट्रांसफॉर्मर और नॉर्मल ट्रांसफार्मर में क्या अंतर होता है। जैसा कि हम सभी को पता है कि एक नॉर्मल ट्रांसफार्मर में मुख्यत: दो वाइंडिंग होती है जोकी एक प्राइमरी वाइंडिंग तथा दूसरा सेकेंडरी वाइंडिंग के नाम से जाना जाता है। और यह दोनों बाइंडिंग में किए गए वाइंडिंग का कार्य होता है वोल्टेज को आवश्यकता अनुसार कम या फिर ज्यादा करना लेकिन ऑटो ट्रांसफार्मर में सिर्फ एक प्राइमरी बाइंडिंग होता है और सेकेंडरी वाइंडिंग को बनाने के लिए प्राइमरी वाइंडिंग के बीच से ही टैप करके आउटपुट ले लिया जाता है जैसा कि आपको  फिगर में दिख रहा होगा।

Auto transformer work कैसे करता है।


Auto transformer self inductance के सिद्धांत पर काम करता है लेकिन थ्री फेज पावर ट्रांसफॉर्मर mutual inductance के सिद्धांत पर कार्य करता है और जैसा कि हम लोगों ने जाना ऑटो ट्रांसफार्मर में सिर्फ एक बाइंडिंग होता है ऑटो ट्रांसफॉर्मर का जो वाइंडिंग होता है प्राइमरी और सेकेंडरी वह वैद्युतीयक तथा चुंबकीय दोनों तरह से आपस में जुड़ी होती है लेकिन अगर बात किया जाए थ्री फेज ट्रांसफार्मर की तो यह ट्रांसफार्मर आपस में सिर्फ चुंबकीय रूप से दोनो वाइंडिंग आपस में जुड़े होते हैं। जैसा कि आपको नीचे के फिगर में दिख रहा होगा v1 सप्लाई जिसके साथ जुड़ा हुआ है वह प्राइमरी वाइंडिंग कहलाता है तथा जो वाइंडिंग बीच से टाइपिंग हो करके लोड के साथ जुड़ा होता है उसे सेकेंडरी वाइंडिंग कहते हैं यह वाइंडिंग में टैपिंग का निर्धारण आवशकता अनुसार वोल्टेज के हिसाब से किया जाता है जैसे अगर हमें आउटपुट वोल्टेज 240V चाहिए तो हमें सबसे पहले ट्रांसफार्मर का ratio निकालना पड़ेगा उसके बाद सेकेंडरी वाइंडिंग को रेशियो के हिसाब से टैप करेंगे। इसके साथ साथ ट्रांसफार्मर में जो भी चुंबकीय फ्लक्स स्थानांतरित होती है वह इंडक्शन के कारण होती है लेकिन ऑटो ट्रांसफार्मर में चुंबकीय फ्लक्स का स्थानांतरण होना induction और conduction दोनों तरफ से होता है ऐसा इसलिए क्योंकि इस ट्रांसफार्मर के दोनों वाइंडिंग को अगर देखा जाए तो एक दूसरे से जुड़े होते हैं इसलिए ऑटो ट्रांसफार्मर में कंडक्शन बिधी के द्वारा भी चुंबकीय फ्लक्स प्रवाहित होती है।
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Auto transformer types


यह ट्रांसफार्मर मुख्यतः दो प्रकार का होता है पहला स्टेप अप ट्रांसफॉर्मर दूसरा स्टेप डाउन ट्रांसफॉर्मर
स्टेप अप ट्रांसफॉर्मर वह ट्रांसफॉर्मर होता है जो लो वोल्टेज को हाई वोल्टेज में बदल दे उसे स्टेप अप ट्रांसफॉर्मर कहते हैं।
स्टेप डाउन ट्रांसफॉर्मर  इस प्रकार के ट्रांसफार्मर का उपयोग हाई वोल्टेज को लो वोल्टेज में बदलने का कार्य करता है।

Auto transformer का उपयोग


. अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत सप्लाई बराबर ना होने के कारण गांव के लोग स्टेबलाइजर का प्रयोग करते हैं स्टेबलाइजर में उपयोग होने वाला ट्रांसफार्मर एक प्रकार का ऑटो ट्रांसफॉर्मर होता है।
. Testing equipment में भी इस ट्रांसफार्मर का प्रयोग किया जाता है जैसे ट्रांसफार्मर का ओपन सर्किट टेस्ट तथा शॉर्ट सर्किट टेस्ट में उपयोग होने वाले उपयंत्र में भी auto transformer का उपयोग किया जाता है।
. कई बार इंडक्शन मोटर और सिंक्रोनस मोटर को स्टार्ट करने के लिए एक स्टार्टर की तरह ऑटो ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।
. और जहां कहीं भी variable voltage supply की आवश्यकता पड़ता है वहां पर ऑटो ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।

Advantage of auto transformer in hindi


इस ट्रांसफार्मर का advantage and disadvantage दो वाइंडिंग वाले ट्रांसफार्मर से तुलना करके बताया जाएगा।

. इस में उपयोग होने वाला कंडक्टिंग मैटेरियल बहुत ही कम होता है। क्योंकि इसमें एक वाइंडिंग होता है।
. यह बहुत ही सस्ता होता है तुलना किया जाए अगर नॉर्मल ट्रांसफार्मर से तो।
. यह ट्रांसफार्मर बहुत ही छोटे साइज में उपलब्ध होते हैं।
. इसमें लीकेज रिएक्टेंस कम होने के कारण इसमें लाशेस बहुत ही कम होता है।
. यह वेरिएबल वोल्टेज में उपयोग होने के कारण इसके बहुत सारे फायदे और होते हैं।

Disadvantage of auto transformer in Hindi


. इस प्रकार के transformer का disadvantage सबसे बड़ा यह होता है कि इसका शॉर्ट सर्किट करंट बहुत ही ज्यादा होने के chances बने रहते हैं क्योंकि इस प्रकार के ट्रांसफार्मर में impedance बहुत कम होता है। 

. Auto transformer मे अगर सेफ्टी की दृष्टि से देखा जाए तो यह बहुत ही ज्यादा घातक होता है। जैसे इसे एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं मान लीजिए आपके पास दो वाइंडिंग वाला ट्रांसफार्मर है अगर उस ट्रांसफार्मर के प्राइमरी वाइंडिंग में 230 वोल्टेज देते हैं और आउटपुट वोल्टेज उसका सिर्फ 12 वोल्टेज है तो अगर ट्रांसफार्मर में लोड नहीं कनेक्ट है तो आउटपुट वोल्टेज दो बाइंडिंग वाले ट्रांसफार्मर में सिर्फ 12 वोल्टेज ही मिलेगा अगर कोई व्यक्ति गलती से दो फेज वाइंडिंग को टच भी करता है तो उसे बहुत ही हल्का झटका लगेगा लेकिन अगर यही बात किया जाए ऑटो ट्रांसफार्मर में तो ऑटो ट्रांसफॉर्मर का यदि सेकेंडरी वाइंडिंग बिना लोड का है तो अगर कोई व्यक्ति उसे टच करता है तो उसे पूरा का पूरा 230 वोल्टेज के झटके का एहसास होगा। कुल मिला जुला कर के दो वाइंडिंग वाले ट्रांसफार्मर के अपेक्षा ऑटो ट्रांसफॉर्मर इलेक्ट्रिकल की दृष्टि से सेफ्टी पूर्ण नहीं होता है।


Note :- transformer को हमेशा kVA and MVA में ही किसी भी प्रकार का इलेक्ट्रिकल कैलकुलेशन किया जाता है।

ऑटो ट्रांसफार्मर के इस छोटे से पोस्ट में आपके बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर मिल गए होंगे अगर आप इस पोस्ट के लिए किसी भी प्रकार के सलाह या सुझाव देना चाहते हैं तो आप हमें कमेंट करके जरूर बताएं इस पोस्ट को पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।



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